सोनम वांगचुक
लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता, नवप्रवर्तक और शिक्षाविद सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तारी ने पूरे देश में चिंता और आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। एक शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी मांगें रखने वाले व्यक्ति को इस प्रकार से गिरफ्तार करना, न केवल अलोकतांत्रिक है बल्कि यह भारतीय संविधान की आत्मा के भी विरुद्ध है।
सोनम वांगचुक लद्दाख के पारिस्थितिकी, शिक्षा और स्वशासन के मुद्दों को लेकर लंबे समय से आवाज़ उठा रहे हैं। उनकी हालिया मुहिम – जिसमें छठी अनुसूची के तहत लद्दाख को संवैधानिक संरक्षण देने की मांग की गई थी – पूरी तरह शांतिपूर्ण और अहिंसात्मक थी। उन्होंने संविधान के दायरे में रहकर जनजागरूकता बढ़ाई, अनशन किया और सरकार से संवाद की मांग की।
NSA जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति पर करना, जो न तो हिंसा में शामिल है और न ही किसी तरह की राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में, न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह सरकार की असहिष्णुता को भी उजागर करता है। NSA उन मामलों में लगाया जाता है जहाँ व्यक्ति की गतिविधियाँ सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बनें — क्या एक गांधीवादी तरीके से अनशन करना खतरा है?
यह गिरफ्तारी एक खतरनाक उदाहरण प्रस्तुत करती है कि कैसे लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है। अगर एक शिक्षित, सम्मानित और शांतिप्रिय नागरिक की आवाज को NSA के तहत कुचल दिया जाएगा, तो यह आने वाले समय में लोकतंत्र के लिए घातक संकेत है।
वांगचुक की गिरफ्तारी का सीधा अर्थ यह है कि सरकार लद्दाख की जनता की आवाज सुनने को तैयार नहीं है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जिन मुद्दों पर बात होनी चाहिए – जैसे जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिकी संतुलन, और जनजातीय अधिकार – उन पर संवाद करने की बजाय उन्हें दबाया जा रहा है।
इसलिए यह जरूरी है कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को तुरंत रद्द किया जाए, और उनके साथ संवाद कर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की जाए। भारत का संविधान हमें बोलने, विचार रखने और असहमति जताने का अधिकार देता है – और इस अधिकार को छीनना संविधान का अपमान है।
लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं होती – यह एक ज़रूरी शक्ति होती है जो सत्ता को जवाबदेह बनाती है।